जलता बंगाल - ममता बनर्जी का कुशासन


Posted on February 4, 2019 at 6:00 AM


West Bengal

जब भी मैं बंगाल के बारे में सोचता हूं या बंगाल का ख्याल करता हूं मुझे कवि प्रदीप द्वारा लिखित और मशहूर बंगाल के गायक हेमंत कुमार द्वारा गाए वह गीत के बोल याद आ जाते हैं वह गीत है यह है अपना बंगाल यहां का चप्पा चप्पा हरियाली है यहां का बच्चा.बच्चा देश पर मरने वाला है। बोल तो एकदम सही है यह स्वरूप व्यापी है कि जो संघर्ष बंगाल के लोगों ने आजादी की लड़ाई में किया है वैसा संघर्ष पूरे हिंदुस्तान में शायद ही किसी अन्य प्रांत के लोगों ने किया होगा जो बलिदान त्याग बंगाल के लोगों ने दिया है वह त्याग और बलिदान अन्य किसी प्रदेश के लोगों ने शायद ही दिया बंगाल के बारे में अंग्रेजी में एक और बात कही जाती है की वर्ड्स बंगाल थिंक टुडे इंडिया थिंग्स टुमारो यानी कि जो बंगाल आज सोचता है वही चीज भारत कल सोचता है।

बंगाल ने ना सिर्फ खुदीराम बोस जतिन दास जैसे क्रांतिकारियों को जन्म दिया है बल्कि ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे समाजशास्त्री और रविंद्र नाथ टैगोर जैसे साहित्यकार को भी जन्म दिया है बंगाल ने ही हमें सुभाष चंद्र बोस जिन्हें हम प्यार से नेता जी कहते हैं जैसे महान विभूति भी हमें दी है बंगाल का योगदान आजादी की लड़ाई में तो था ही साहित्य में भी बंगाल का काफी योगदान रहा है यहां तक की हिंदी सिने जगत में भी एक समय बंगाल का दबदबा हुआ करता था। वह पुराना बंगाल था वह बंगाल आज के बंगाल से काफी भिन्न था आज बंगाल काफी बदल गया है बंगाल की बदलने की कहानी शुरू होती है 70 के दशक में जब बंगाल में नक्सल आंदोलन का जन्म हुआ नक्सल आंदोलन 70 के समय में चालू तो जरूर हुआ मगर उसे मजबूती मिली इमरजेंसी के वक्त और 1977 में जब बंगाल चुनाव में पहली बार सत्ता बदली तो साथ ही बंगाल का समाज भी बदला 77 के चुनाव में पहली बार वहां कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस को पराजित करके अपनी सरकार सरकार बनाई और 29 सालों तक बंगाल में राज्य किया इस दौरान वामपंथियों ने बंगाल की अर्थव्यवस्था को तहस.नहस कर दिया पहले जो बंगाल उद्योगिक हब माना जाता था वही बंगाल में धीरे.धीरे उद्योगों का पलायन जारी हो गया पहले जो लोग रोजगार की तलाश में कोलकाता जाते थे अब वही कोलकाता के ही लोग रोजगार की तलाश में कोलकाता छोड़कर देश के अन्य शहरों में जाने लगे बंगाल में बेरोजगारी का बढ़ना चालू रहा पर वामपंथियों ने अपना शासन कमजोर नहीं होने दिया उसका मुख्य कारण था कि वामपंथियों ने बंगालियों की एक कमजोरी को माप लिया था और वह कमजोरी थी कि बंगालियों को दो वक्त मॉस भात मिल जाए फिर वह सारे दुख सहने को तैयार रहते हैं उनके लिए अन्य चीजें उतनी मायने नहीं रखती प थी उनमें उत्तेजना तो होती है पर होश नहीं रहता है वह पैसे तो चाहते थे पर काम करना नहीं चाहते थे धीरे धीरे करके वामपंथियों ने बंगाल को गर्क में धकेलना चालू कर दिया।

बहुत कुछ खोने के बाद जब बंगालियों ने यह देखा कि अरे हम कहां रह गए और सारा देश कहां निकल गया तो उन्हें वामपंथियों के प्रति रोष आया और फिर 2011 के चुनाव में उन्होंने वामपंथियों को बंगाल से विदा कर दीया और वर्षो से संघर्ष कर रही एक जुझारू नेता ममता बनर्जी को बंगाल की कमान मिला। ममता बनर्जी ने शुरुआत तो काफी अच्छी की और पहले की कुछ वर्षों में काफी अच्छे काम भी दिखाएं जिसके कारण बंगाल की कई शहरों में काफी तरक्की भी हुई कई प्रमुख सड़के बनी कई प्रमुख आईटी क्षेत्र की कंपनियों ने बंगाल में अपना निवेश किया। मगर यह कहा जाता है ना कि आप एक विरोधी तो अच्छे हो सकते हैं पर एक शासक अच्छा नहीं हो सकते ममता के साथ भी ठीक वही हुआ वह जिन बातों का विरोध करके सत्ता में आई धीरे धीरे वह उसी बातों का पक्ष लेने लगी वह भी वामपंथियों के तरफ प्रेस पर लगाम लगाने लगी लोगों की आवाज दबने लगी। अपने विरोधियों को कुचलने का प्रयास करने लगीए इन सब की प्रमुख वजह थी कि जो वामपंथी कम्युनिस्ट की सरकार में सिंडिकेट संभालते थे वह सारे लोग जब तृणमूल की सरकार बनी तो वामपंथी दल को छोड़कर तृणमूल में आ गया इसी कारण जमीन पर बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं आया और जो कुशासन वामपंथियों ने बंगाल में किया वहीं कुशासन तृणमूल के समय में भी चालू हो गया और ममता ने भी सोचा जब हम वामपंथी 29 साल तक यह कुशासन करके बंगाल पर राज्य कर सकते हैं तो वह भी कुछ ऐसा ही क्यों ना करें और फिर 29 साल के बाद क्या होता है उससे उन्हें क्या इसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल में फिर से अराजकता का माहौल आ गया रोज नए.नए दंगे होने लगे विरोधियों को दबाया जाने विरोधियों के औरतों पर अत्याचार करने लगे उनके साथ बलात्कार की घटनाएं होने लगी।

ममता बनर्जी महत्वाकांक्षी होने लगी वह आप अपने आप को बंगाल तक कि नहीं देखना चाहती थी वह अब अपने आप को राष्ट्रीय राजनीति में देखना चाहती है और इसके लिए वह हर काम में नरेंद्र मोदी और भाजपा का विरोध करने लगी अपने आप को मोदी के विकल्प के रूप में दिखाने के लिए उन्होंने भाजपा के कार्यकर्ताओं को बंगाल में कत्लेआम चालू करा दिया भाजपा के कई कार्यकर्ताओं को पंचायत चुनाव के दौरान मौत के घाट उतार दिया गया पर जब त्रिपुरा में भाजपा ने 29 साल से चली आ रही है कम्युनिस्ट की सरकारों को हरा कर वहां सरकार बनाई तो ममता की बेचैनी और बढ़ गई उसका प्रमुख कारण यह था कि त्रिपुरा में भी बंगालियों की अत्याधिक संख्या थी और उन्हें लगा कि जब वहां के बंगाली भाजपा की तरफ जा सकते हैं तो फिर बंगाल के बंगाली भी भाजपा की तरफ जा सकते हैं इसके कारण उनका भाजपा के कार्यकर्ताओं के प्रति रोष और बढ़ गया उनके खिलाफ हिंसा की घटनाएं और तेज हो गई बात हिंसा तक कि नहीं रुकी ममता ने जब यह देखा कि देश में बीजेपी की वैकल्पिक राजनीति पार्टियां एक हो रही है तो उन्होंने यह सोचा कि अगर वह भाजपा को कोसे तो उनकी कद और बढ़ेगी इस वजह से उन्होंने भाजपा द्वारा प्रायोजित रथ यात्रा को बंगाल में मंजूरी नहीं दी इसके अलावा उन्होंने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ भी राजनीतिक हिंसा की उसके अलावा जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बंगाल में रैली का आयोजन करना चाहा तो उन्होंने उनको उनकी भी इजाजत नहीं दी अभी हाल में जब उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री बंगाल में एक रैली को संबोधित करना चाह रहे थे तो ममता ने उसकी भी इजाजत नहीं दी योगी को फोन के द्वारा ही अपने भाजपा समर्थकों को संबोधित करना पड़ा।

ममता जो कर रही है वह तो गलत है ही मगर जो सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात है वह है दरबारी मीडिया कर्मियों की आप अंदाजा लगाइए यही बात अगर किसी भाजपा शासित प्रदेश में होता तो मीडिया दिन रात कैसी खबरें चलाता वह दिन.रात लोगों को यह बताने में लग जाता कि भाजपा ने लोकतंत्र की हत्या कर दी है भाजपा संविधान को बदलना चाहती है भाजपा ऐसी है भाजपा वैसी है पर इतना हत्या और आगजनी के बाद भी बंगाल के खिलाफ प्रभावी मीडिया कुछ भी कहने से डर रही है वह अपनी दीदी ममता को नाराज नहीं करना चाहती है वह आज भी ममता को सबसे बड़ी सर्कुलर लीडर मानती है और उनकी हर झूठ पर पर्दा डालने का काम कर रही है पर वह एक बात भूल चुकी है यह पब्लिक है और पब्लिक सब जानती है वह जब चाहे आपको राजा बना सकती है तो जब चाहे आपको भिखारी भी बना सकती है जय हिंद वंदे मातरम भारत माता की जय।

Search
Ads