क्या कानून सही में अंधा है


Posted on February 6, 2019 at 6:00 PM


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मई 2017 सुप्रीम कोर्ट जिसमें जस्टिस श्री चिलमेशवर भी शामिल थे यह फैसला देती है कोर्ट जस्टिस कुरियन जो कि कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे को कोर्ट की अवमानना का दोषी मानती है। आइए हम समझते हैं कि उनका दोश क्या था जस्टिस कुरियन ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश के न्याय पर सवाल उठाया था और अगर आप सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश के निर्णय पर सवाल उठाते हैं तो उसे कोर्ट की अवमानना मानी जाती है इसलिए सुप्रीम कोर्ट के 5 बैंचो कि न्यायाधीशों ने जिसमे कि जस्टिस चिलमलेश्वर भी शामिल थे ने उन्हें दोषी माना।

12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीश एक प्रेस वार्ता करते हैं जिसमें कि वह तब के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर मन मर्जी का आरोप लगाते हैं और उनपे यह भी आरोप लगाते हैं कि वह अपनी मन मर्जी से मुकदमा का आवंटन करते हैं जिसमें कि भ्रष्टाचार भी होता है उनका मुख्य आरोप था कि वह मुख्य केस में सीनियर वकीलों को ना देकर उनसे कहीं अधिक छोटे वकीलों को केस देते हैं और सीनियर वकीलों को नजरअंदाज करते हैं।

पहले तो न्यायाधीशों जिसमें आज के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी है का प्रेस कॉन्फ्रेंस करना ही एक गलती थी आज तक के भारतीय इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि न्यायाधीशों को प्रेस वार्ता करनी पड़ी हो इससे पहले भी बहुत से न्यायाधीशों में मतभेद हुआ करता था मगर वह आपसी विवाद आपस में बैठ कर सुलझा लिया जाता था यह पहली बार था कि चार न्यायधीश मिलकर एक प्रेस वार्ता की थी हद तो तब हो गई थी जब उसमें से एक जज जस्टिस चेलमेश्वर एक राजनीतिक दल के नेताओं के साथ बात करते पाए गए और यह बात चीत प्रेस कॉन्फ्रेंस के ठीक कुछ मिनटों के बाद होती है जब सारे टीवी चैनलों ने मुलाकात के चित्र अपने अपने स्क्रीन पर दिखाने लगे तब जाकर लोगों को लगा कि यह सब एक साजिश के तहत भारत की विपक्षी पार्टियों ने केंद्र सरकार की लोकप्रियता से घबराकर की थी मगर बात यही खत्म नहीं हुई उसके बाद दीपक मिश्रा पर तरह-तरह के आरोप लगने लगे जब भी उनके फैसल सरकार के पक्ष में होते थे तो सारे विपक्षी दल उन पर टूट पड़ते थे यहां तक कि उनको सरकार का दलाल भी कहा जाता था पर जब भी निर्णय उनके पक्ष में होते थे जैसे कि कर्नाटक में सरकार किसकी बनाई जाए या फिर की सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश का मामला हो जिसमें कि निर्णय उनके पक्ष में हो गया हो तो वह उनकी तारीफ भी करते थे जज लोया के केस में निर्णय उनके खिलाफ गया तो उन्होंने न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी चलाना चाहा किन्तु जब उनको पता चला की मानहानि का मुकदमा चलाने के लिए उनके पास पर्याप्त संख्या नहीं है तब उन्होंने अपना विचार बदल दिया मगर जब तक दीपक मिश्रा मुख्य न्यायाधीश रहे तब तक यह उनके हर निर्णय पर जो भी उनके विरुद्ध जाता था सवाल उठाते रहे।

राम मंदिर जन्मभूमि विवाद एक ऐसा विवाद जिसका कि न्यायालय में मुकदमा काफी दिनों से चल रहा था न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने इसमें तत्परता दिखाते हुए केस का फैसला जल्द निपटाने की कोशिश की और उनकी अध्यक्षता में बनाएं तीन जजों की बेंच ने जब यह फैसला सुनाया कि राम जन्मभूमि विवाद का सुनवाई अब हर रोज की जाएगी तो भारत में करोड़ो श्रद्धालुओं के मन में एक आशा की किरण चली कि अब जल्दी ही राम जन्मभूमि विवाद का निपटारा हो जाएगा पर ठीक उनके जाते हैं या उनके सेवानिवृत्त होते ही श्री रंजन गोगोई न मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला तो ठीक इसके विपरीत उन्होंने राम जन्मभूमि विवाद को प्राथमिक सूची से हटा कर सम्मान सूची में कर दिया यानी की सरल भाषा में समझे तो जो सुनवाई रोज होने वाली थी उसको स्थगित कर दिया और नए सिरे से उस पर सुनवाई करने का निर्णय लिया जो कि 3 महीने गुजर जाने के बाद भी आज तक 5 मिनट की भी सुनवाई नहीं हो पाई ऐसा लगता है जैसे कि राम जन्मभूमि विवाद का मुकदमा भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और यह पहली बार नहीं है जबकि सुप्रीम कोर्ट के फैसल में साजिश की भनक लगती है आइए हम एक अन्य मुकदमे की तरफ नजर डालते हैं अभी ठीक पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले प्रशांत भूषण जो कि पहले आम आदमी पार्टी के मेंबर थे और बाद में फिर अपनी एक नई पार्टी बनाई और मुख्य तोर पर भारत विरोधी कार्यों में में लगे रहते हैं और आतंकियों के लिए भी केस लड़ते हैं ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल की वह रफाइल मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत उस पर सुनवाई का निर्णय लिया और 10 से 15 दिनों तक लगातार सुनवाई की उन्होंने सरकार से तरह तरह के सवाल पूछे उन्होंने यहां तक कि वायु सेना के बड़े अधिकारियों को भी कोर्ट में बुलाया उनसे भी सवाल जवाब किए और सारे सवाल करने के बाद वह फिर काफी देर तक शांत बैठ गय उन्होंने मामला का निर्णय नहीं सुनाया निर्णय सुनाया गया जब पांच राज्यों के चुनाव के नतीजे आ गए और पांचू राज्य में जब एनडीए की हार हो जाती है तब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि रफाल में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की कोई जरूरत नहीं है सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि रफाल में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है इसकी जांच करना जरूरी नहीं है जो जिस केस की सुनवाई काफी पहले ही हो चुकी थी उसकी निर्णय को लिखने में 1 महीने की देरी की गई 1 महीने की देरी क्यों की गई यह सोच के पड़े है उस देरी में भी एक बड़ी मजेदार चीज हुई की टाइपिंग एरर होती है जिसे सरकार ने तुरंत ही सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाती है कि यहां अपने एक टाइपिंग एरर कर दी है कृपया उसे सुधार दीजिये जिस पर अभी तक सुप्रीम कोर्ट न कोई फैसला नहीं लिया है या कोई सुधार नहीं किया अब इसी को पकड़कर इसी एक लाइन को पकड़कर विपक्षी दल और उनके गोदी मीडिया के लोगों ने जिन्हें कि हम अंग्रेजी में लुटियंस मीडिया भी कहते हैं सरकार पर आरोप लगाते रहे उसके बाद एक अन्य मुकदमा के तरफ आते हैं यह मुकदमा है सीबीआई के दो बड़े ऑफिसर नंबर वन और नंबर दो के बीच की लड़ाई का सीबीआई के दो बड़े ऑफिसर आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना आपस में एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं मामला मीडिया और सरकार तक पहुंचती है सरकार सीवीसी से सलाह मशवरा करती है सीवीसी ने सरकार को सलाह दिया कि दोनों को छुट्टी पर भेज दिया जाए सरकार ऐसा ही करती है दोनों को छुट्टी पर भेज दिए जाते हैं मगर फिर से आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं उनके वकील विपक्ष के कुछ बड़े नेता रहते हैं सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई होती है सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के निर्णय देते हैं कि आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजना गलत था उन्हें पद पर बहाल किया जाए लेकिन साथ ही एक हिदायत भी देते हैं कि मैं कोई पॉलिसी डिसीजन लेने का अधिकार नहीं रहेगा पॉलिसी डिसीजन ले सके या नहीं इसके लिए 3 मेंबरों की प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कमेटी बनती है इसमें प्रधानमंत्री के अलावा विपक्ष के नेता मलिकार्जुन खरगे और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सीकर शामिल होते हैं बेंच ने 2-1 से फैसला आलोक वर्मा के विपक्ष में सुनाए जिसके कारण वर्मा इस्तीफा दे देते हैं मगर उनका इस्तीफा देना था कि फिर से विपक्षी दलों और कुछ गुलाम मानसिकता की मीडिया वालों ने यह खबर फैल आनी शुरू कर दी कि जस्टिस सीकरी भी आर एस एस के कार्य करता है वह भी एक संघीय है उन्हें मोदी ने पद का लालच दिया था जिसकी वजह से वह प्रधानमंत्री के साथ आलोक वर्मा के खिलाफ डिसीजन दिए और तरह-तरह के उनके चरित्र हनन की जाती है मगर ताज्जुब की बात होती है कि इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कुछ नहीं बोलते हैं वह फिर से चुप रहते हैं।

जैसा कि मैंने आपको पहले ही बताया कि राम मंदिर का मुद्दा रंजन गोगोई के लिए प्राथमिक मुद्दा नहीं था उन्होंने उस को सम्मान केस के तौर पर रखा था लेकिन जब 9 जनवरी को 3 बैंचो की टीम बनती है अयोध्या मामले में सुनवाई करने को तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकीलों ने न्यायाधीश की नियुक्ति पर आपत्ति की इसके कारण मुकदमे बिना सुने ही स्थगित कर दिया गया और 29 तारीख को फिर से एक नई तारीख रखी गई जिसमें केस की सुनवाई होगी मगर ठीक 29 जनवरी के कुछ दिन पहले यह खबर आती है कि उसमें से एक न्यायाधीश छुट्टी पर है जिसके कारण फिर से केस की तारीख बढ़ा दी जाती है हालांकि अभी तक उसकी तारीख नहीं आई है। अब हम आते हैं बंगाल मे वामपंथी और कांग्रेस के कुछ नेताओं सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा कि बंगाल में चिटफंड के नाम पर 2000000 लोगों के करीब 40000 या 35000 करोड रुपए का गबन किया गया और यह जो 2000000 लोग हैं वह समाज के निम्न मध्यमवर्गीय छोटे तबके के लोग है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मई 2014 में सीबीआई को इसकी इन्वेस्टिगेशन का जिम्मा सौंपा सीबीआई हमेशा की तरह अपनी रफ्तार से काम कर रही थी काम में अनेक बाधाएं आ रही थी क्योंकि बंगाल सरकार पर ही आरोप था कि उन्होंने ही यह घोटाला करवाया था सीबीआई ने वहां के पुलिस कमिश्नर पर शक था इसके लिए उन्होंने उनको पूछताछ के लिए 3 बार समन्नं भेजा वह नहीं आये हमेशा कुछ न कुछ बहाना बना दिया तो सीबीआई उनके घर पर पूछताछ करने पहुंची है तो भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब वहां की सरकार सीबीआई के रोकने के लिए खुद वहां की मुख्यमंत्री ढाल बनकर खड़ी हो जाती है और सीबीआई के अफसरों को पुलिस के द्वारा गिरफ्तार करवा देती है और खुद धरने पर बैठ जाती है मामला सुप्रीम कोर्ट जाता है हमेशा की तरह सुप्रीम कोर्ट इसमें कोई जल्दी नहीं दिखाता है जो सुप्रीम कोर्ट आतंकवादियों के लिया रात को अपना दरवाजा खोल देती थी इसके इसके लिए वह सुबह 10:30 बजे सुनवाई करती है और आधे घंटे की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आप हमें सबूत लाकर दो हम कार्यवाही करेंगे अगले दिन सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में सबूत पेश किए तो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने हालांकि कमिश्नर को यह तो बोला कि आपको सीबीआई के आगे पेश होना पड़ेगा मगर सीबीआई आप को गिरफ्तार नहीं कर सकती है साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत बड़ी चीज पर संज्ञानं लिया और वह चीज थी कि आप कमिश्नर हो कर किसी राजनीतिक दल के साथ धरने पर कैसे बैठ सकते हैं।

अब आप कहोगे की रफाल हो आलोक वर्मा का केस या फिर ममता बनाम सीबीआई हो सारी मुकदमों में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का पक्ष रखा फिर आप कैसे कह सकते हो कि सुप्रीम कोर्ट विपक्ष के लिए काम कर रहा तो मेरा उत्तर साफ है यह वह केस है जिसमें मामला आईने की तरफ साफ था जिसमें सुप्रीम कोर्ट को मजबूरी में यह निर्णय लेना पड़ा क्योंकि इन सारे केसों में विपक्ष के पास कोई सबूत नहीं थे वह सिर्फ राजनीति के उद्देश्य से केस किए गए थे उन्हें भी पता था कि उन्हें हार का मुंह देखना पड़ेगा रफाल के मामले में तो जिस पार्टी ने सबसे ज्यादा सरकार के ऊपर आरोप लगाए वह खुद केस नहीं करती है वह खुद मुकदमा नहीं दायर करती है मगर सिर्फ मोरल सपोर्ट देती है और जब सुप्रीम कोर्ट ने वह केस को खारिज किया तो वह कहती है कि हमने तो कोई मुकदमा नहीं किया था क्योकि उनके पास कुछ आधार नहीं है यह सारी खेल तो एक परसेप्शन बनाने का था जिसमें देश की भोली-भाली जनता को गुमराह किया जा सके इनको तो पहले सुप्रीम कोर्ट को 2 से 3 दिन में निर्णय दे देना चाहिए था मगर फिर भी उनको काफी लंबा क्यों खींचा गया और सबसे बड़ा मुद्दा तो राम जन्मभूमि विवाद का है अक्टूबर में ही जब पिछले न्यायाधीश ने यह कह दिया था कि इस मामले की सुनवाई रोज होगी तो 4 महीने गुजर जाने के बाद भी आज तक एक भी सुनवाई क्यों नहीं होती है यहां मैं आप सब को यह बताना चाहूंगा कि, दिसंबर 2018 को जब यह केस चल रहा था तब मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल जो की कांग्रेस के कद्दावर नेता भी है सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी थी कि इस मुकदमे का फैसला 2019 के चुनाव के बाद होनी चाहिए ऐसा क्यों हालकि उस वक्त के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने खारिज करते हुए कहा था कि कोई भी मुकदमा चुनाव के लिए नहीं रोका जा सकता है मगर अभी तो यह साफ लग रहा है कि आज के मुख्य न्यायाधीश इस मामले की गंभीरता को समझते हुए भी इस पर विशेष ध्यान नहीं दे रहे आप क्यों नहीं दे रहे हैं लोग इसका कारण उनके परिवार का कांग्रेस सदस्य होने को समझ रहे हैं या कोई अन्य कारण है यह तो जज महोदय ही बता सकते हैं मगर दाल में कुछ काला तो जरूर है जो सुप्रीम कोर्ट आतंकियों के लिए रात को दरवाजे हो सकता है वह जब खुद सीबीआई एक राज्य सरकार पर काम नहीं करनी देती है उसकी सुनवाई के लिए 2 दिन का समय लेती है जब कर्नाटका में गलत ढंग से या अल्पमत की सरकार बनाई जाती है तो फैसला रातों रात आ जाता है। मै तो सिर्फ इतना कहता हु की अगर न्याय देर से मिले तो वह न्याय न्याय नहीं अन्याय होता है ।

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